Tuesday, 31 December 2013

यह कैसा उत्सव !

आज वर्ष 2014 आ गया और हम 2013 को पीछे छोड़ आए। सभी लोग इस नए साल के स्‍वागत के लिए कई  तरह के पार्टियों का आयोजन या फिर किसी जगह जाकर इसे मनाने की तैयार कर चुके थे। इस दौरान बच्‍चे से लेकर महिलाएं, बृजुर्ग और युवा लड़के व लड़ि‍कया एक साथ्‍ एक ही मंच पर दिखाई देते हैं और नाच-गाकर नए साल का स्‍वागत और पिछले साल को विदा करते हैं।

मैं भी कल पहली बार अपने दोस्‍तों संग इस तरह के किसी  पार्टी में शामिल हुआ। इस दौरान मैंने सभी दोस्‍तों संग नए साल पर खुब एंजॉए किया। इस दौरान मैं वहां पर आए हुए बड़े लोगों को एंजॉए करने के तरीके को देख रहा था। एक हाथ में शराब की बोतल, मुंह में सिगरेट, एक हाथ पत्‍नी या दोस्‍तों के कमर में और साथ में बच्‍चे भी। सभी एक साथ डांस करते दिखे।

यह आज की भारतीय सभ्‍यता है जहां, एक छोटा बच्‍चा अपने मम्‍मी-पापा को किसी पार्टी में शराब  और सिगरेट पीते हुए और उनके साथ डांस करते हुए देखता है। यहीं नहीं, उनके साथ कुछ और भी दोस्‍त होतें हैं जिसमें, लड़किया  और बेटे के उम्र के लड़के, उनके साथ मस्‍ती कर रहे होते हैं। बच्‍चा भी खुशी-खुशी इस पल का लुफ्त उठाता है।
इस तरह का माहौल एक ही जगह पर नहीं, बल्कि भारत के सभी क्ष्‍ोत्रों में आज देखा जा सकता है। इस तरह का माहौल हमारे भारतीय पर्व-त्‍योहारों पर नहीं देखा जाता है। इसका कारण है हम उसे अब जीना ही नहीं चाहते। हम भुल जाना चाहते हैं अपनी पुरानी और भारतीय संस्‍कृति को। हम तो केवल विदेशी संस्‍कृति ही जीना चाहते हैं और उसी में हम खुश रहते हैं, और अपने बच्‍चों को भी यही सिखाते हैं।

क्‍या यह हमारी संस्‍कृति है जहां, पत्‍ती-पत्‍नी, दोस्‍तों और नए युवाओं के साथ कमर से कमर मिलाकर डांस करते हैं, भड़कीले कपड़े पहनते हैं, शराब और सिगरेट पीते हैं, पत्‍नी किसी और पुरुष के साथ, और पत्‍ती किसी और लड़की के साथ उत्‍सव मनाता है? यह हमारी भारतीय संस्‍कृति तो नही, मगर विदेशी संस्‍कृति का प्रभाव अवश्‍य है। और आगे जाकर हम अपने बच्‍चों को यही सीख देने वाले हैं कि तुम भी इस तरह के माहौल के आदी हो जाओ।

आपको बता दें की इसका प्रचलन 1995 के बाद हुआ जब भारत में निजी टेलीविजन और निजी एमएफ चैनल का विकास हुआ। इसी ने विदेशी सभ्‍यता और विदेशी पर्व-त्‍योहारों के बारे में हमें बताया और हम उसे ही जीने लगे। मगर क्‍या हमें अपनी संस्‍कृति को भुल कर दूसरे की संस्‍कृति की ऐसे जीना चाहिए?


ऐसे ही बहुत सारे प्रश्‍न हमारे मन में हैं जो आपसे करना चाहता है। मगर क्‍या करें, भारत में सभी को स्‍वतंत्रता का अधिकार जो है और उसे पूरा हक है अपने जीवन को अपने तरह से जीने का। मगर इसे अधिकार ने हमें अपनी संस्‍कृति और अपने परिवारों सहित रिस्‍ते-नाते, सभी को भुला दिया है। अब हमें फिर से सोंचना होगा कि यह कैसा उत्‍सव है