Friday, 3 January 2014

जब मेरा होता अपमान तो होता है दर्द !

आपने माखनलाल चतुर्वेदी की कविता ‘पुष्‍प की अभिलाषा’ तो पढ़ी होगी और, आपको उस कविता की हर एक पक्‍ति भी याद आती होगी। मुझे भी आज अचानक ही इस कविता की दो पंक्ति याद आ गई, जिसमें पुष्‍प कहता है: ‘चाह नहीं, सम्राटों के शव पर हे हरि, डाला जाऊं, चाह नहीं, देवों के सिर पर, चढूं भाग्‍य पर इठलाऊं। मुझे तोड़ लेना वनमाली, उस पथ पर देना तुम फेंक, मातृभूमि पर शीश चढ़ाने, जिस पर जावें वीर अनेक।‘

पूरे भारत में आजकल शादी का माहौल चल रहा है साथ ही, पर्व त्‍योहार भी आ गए हैं। इस दौरान अचानक ही फूलों की बिक्री बढ़ जाती है। लोग फूलों को देवी-देवाताओं पर चढ़ाने, घरों को सजाने, किसी का स्‍वागत में पुष्‍प वर्षा करने तथा राजनेताओं के गले में डालने के लिए प्रयोग करते हैं। इसमें अतिर्थियों के साथ-साथ मेजबानों को भी खुशी मिलती है।

हम फूलों को एक और कार्य के लिए सबसे ज्‍यादा प्रयोग करते हैं – व्‍यक्ति की मृत्‍यु के बाद उसके शव पर चढ़ाने के लिए। कहा जाता है कि मृत्‍यु के बाद शव पर फूल चढ़ाने से मरने वाले व्‍यक्ति के आत्‍मा को खुशी मिलती है। यह बात सही भी लगती है क्‍योकि, भारतीय संस्‍कृति के अनुसार, केवल देवताओं पर, किसी की मृत्‍यु पर या फिर सरहद पर लड़ रहे सैनिकों के कदमों में डाले जाने की प्रथा है। बाद में इसमें शादी-विवाह भी जुड़ गया और आज हर तरह के शुभ कार्य में फूलों का प्रयोग शुभ माना जाता है।

लेकिन क्‍या आपको मालूम है कि इस तरह फूलों को किसी भी जीवित व्‍यक्ति पर चढ़ाने और उसे रास्‍ते में फेंकने के बाद फूलों को कैसा लगता होगा? उसे भी हमारी तरह ही दर्द होता है। माखनलाल चतुर्वेदी, हजारी प्रसाद द्विवेदी, हरिवंश बच्‍चन सहित देश के जाने-माने साहित्‍यकारों का मानना है कि जीवित व्‍यक्ति पर पुष्‍प चढ़ाने से उसकी आयु कम हो जाती है और लोगों की नजरों में इसे मरा हुआ समझा जाता है।

पंजाबियों का सबसे महान पर्व गुरु गोविंद सिंह की जयंती को बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। इस दौरान लोग बोरियां भर-भरकर बाजारों से फूल खरीदते हैं और लोगों के घरों में बांटतें हैं। जब गुरु गोविंद सिंह की पालकी निकलती है तो लोग उनके ऊपर पुष्‍प वर्षा (फूलों को फेंकना) करते हैं। इस दौरान फूल पूरे रास्‍ते में बिखर जाते हैं और, हमारे पैरों तले कुचले जाते हैं।

अब आप ही बताईए कि, इन फूलों की दुर्दशा देख किसका मन नहीं दुखेगा? जब कोई हमें थोडा से भी नुकसान पहुंचाता है तो, हमें काफी दर्द होता है। फूलों को भी तो दर्द होता है न। आखिर वह भी एक जीवित वर्ग की एक क्षेणी में आता है और हमारी तरह ही जन्‍म लेता और मरना है, मगर उसपर कोई ध्‍यान नहीं देता। अगर ध्‍यान भी देता है तो केवल अपने घर की शोभा बढ़ाने के लिए।


इसी फूलों की दर्द को बयां करते हुए माखनलाल ने यह कविता लिखी है। इसलिए आज मैं माखनलाल को याद कर इस कविता को अपने लेख में शामिल कर रहा हूं और इस लेख का श्रेय भी उन्‍हीं को देता हूं।