Monday, 13 January 2014

राजनीति का शिकार कुशाभाउ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय

मैं पिछले दिनों कुशाभाउ ठाकरे पत्रकारिता एंव जनसंचार विश्‍वविद्यालय, रायपुर में पीएचडी के साक्षात्‍कार हेतू गया हुआ था। पहले तो रायुपर स्‍टेशन से विश्‍वविद्यालय जाने में बड़ी परेशानी हुई मगर, जब वहां पहुंचा तो विश्‍वविद्यालय की इन्‍फ्रास्‍ट्रक्‍चर देख दंग रह गया। तीन दिनों के अपने यात्रा के दौरान मैंने विश्‍वविद्यालय के सभी विभागों, पुस्‍तकालय, स्‍टूडियो, कैंपस, हॉस्टल तथा आस-पास के क्षेत्रों के देखा।

इस दौरान मैने देखा की विश्‍वविद्यालय के पास एक अच्‍छी पुस्‍तकालय के अलावा इन्‍फ्रास्‍ट्रक्‍चर और बड़ी कैंपस के अलावा कुछ भी अच्‍छा नहीं है। यह विश्‍वविद्यालय राज्‍य के मुख्‍यमंत्री डॉ. रमन सिंह के सबसे अहम प्रोजेक्‍ट में से एक है, उसके बावजुद यह विश्‍वविद्यालय लगातार घाटे में चल रहा है।

भारत में अभी तक केवल तीन ही पूर्ण रूपेण पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्‍वविद्यालय हैं और तीनों ही राज्‍य विश्‍वविद्यालय हैं। ये तीनों ही विश्‍वविद्यालयों में से माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता एंव जनसंचार विश्‍वविद्यालय सबसे पुरानी है और सफलतापूर्वक चल भी रही है।

कुशाभाउ ठाकरे विश्‍वविद्यालय का गठन 2005 में हुआ। मध्‍यप्रदेश से अलग राज्‍य बनने के बाद उत्‍तराखंड के मुख्‍यमंत्री ने माखनलाल पत्रकारिता विश्‍वविद्यालय की तर्ज पर राज्‍य में कुशाभाउ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्‍वविद्यालस का गठन कराया। इस विश्‍वविद्यालय के गठन हुए पूरे 5 सालों से भी अधिक का समय गुजर गया है मगर, विश्‍वविद्यालय के पास ज्‍यादा जमीन और आकर्षक बिल्डिंग के अलावा कुछ भी नहीं है।

इस दौरान मैने विश्‍वविद्यालय में ही चाय बेचने वाले से मेरी बातचीत हुई तो उसने कई राज खोलें। उसका कहना था कि विश्‍वविद्यालय में हद से ज्‍यादा राजनीति चल रही है। कोई किसी को भी आगे बढ़ने नहीं देता है और लगातार उसका टांग खिचे रहता है। उसका कहना था कि यहां हॉस्‍टल में रह रहे विद्यार्थियों के लिए भोजन की व्‍यवसथा की सही नहीं है।

अपना नाम न बताने की शर्त पर उसने बताया कि यहां के फैकेल्‍टी सदस्‍य उनहें चाय उधार न देने पर दुकान खाली करने की धमकियां देते रहते हैं। एक तो विश्‍वविद्यालय शहर से काफी दूर है और ना ही कोई आवागमन के साधन। इस कारण यहां विद्यार्थी भी कम ही आते हैं।

वहीं विश्‍वविद्यालय के एक विभाग के सहायक प्रोफेसर से बातचीत हुई तो उन्‍होंने भी इस तरह की कमियों को स्‍वीकारा और यह भी कहा की इसे दूर करने के लिए हम लगातार सोशल वर्क कर रहे हैं। इस साल हमने दो गावों को गोद लेकर उसका विकास कर रहे हैं और आने वाले दिनों में एक समुदायिक रेडियो स्‍थापित करने की योजना है।

इसके बाद मैने विश्‍वविद्यालय के अन्‍य सदस्‍यों, चपरासी तथा विद्यार्थियों से बात की। सबसे एक सुर में कहा कि जबतक विश्‍वविद्यालय से राजनीति खत्‍म नहीं होगी, यहां की व्‍यवसथा कभी नहीं सुधरेगी और ना ही ज्‍यादा बच्‍चे यहां आ पाएंगे।

हालांकि विश्‍वविद्यालय की पुस्‍तकालय सबसे अच्‍छी है। साथ ही कैंपस भी सबसे बड़ा है और लगातार यहां पर कार्य हो रहा है। अगर इसी तरह कैंपस को सुधारने का कार्य चलता रहे तो यह विश्‍वविद्यालस देश के सभी पत्रकारिता विश्‍वविद्यालय को कैंपस के मामले में पीछे छोड देगी।