Tuesday, 14 January 2014

कानून केवल महिलाओं के लिए क्यों ??



तीन दिन पूर्व मैं रायपूर गया था। स्‍टेशन से कुशाभाउ ठाकरे विश्‍वविद्यालय जाने के लिए सिटी बस और ऑटों का इंतजार करने लगा। तभी एक व्‍यक्ति ने बताया कि कुशाभाउ ठाकरे विश्‍विद्यालय के लिए सीधे कोई ऑटो या सिटी बस नहीं जाती है। आपको पहले घड़ी चौक, पंचमडी, भाटा गांव चौक और फिर वहां से आपको ऑटो बुक करके विश्‍वविद्यालय जाना होगा।

मैं अपने दोस्‍त के साथ स्‍टेशन से सिटी बस में सवार होकर घडी़ चौक जाने लगा। बस में एक 18 साल की लड़की चढ़ी और आगे की गेट के पास खड़ी हो गई। जब बस चलने लगी तो बस के ड्राइवर और कंडक्‍टर ने उसे खाली सीट पर बैठने को कहा, तो अपनी कुछ परेशानी बताकर सीट पर बैठने से मना कर दिया। कंडक्‍टर ने उसे गेट से थोडा पीछे हटकर खड़ा होने का निवेदन किया जिसे लड़की ने नकार दिया।

जब बस के ड्राइवर और कंडक्‍टर ने उसे कड़े शब्‍दों में डांटकर उसे बस से नीचे उतरने, सीट पर बैठने तथा गेट से पीछे खड़े होने का कहा तो वह लड़की बदतमीजी पर उतर आई। बस के सभी सवारियों ने लड़की को बहुत समझाने का प्रयास किया, मगर वह नहीं मानी। तबतक हमारा स्‍टॉप आ गया था। हम वहां से एक ऑटो पर बैठ पंचमडी जाने लगे।
मेरे साथ बैठे दोस्‍त ने मुझसे कहा कि बस का कंडक्‍टर लड़की से कितनी बदतमीजी से बात कर रहा था, मेरा मन कर रहा था कि उस बस कंडक्‍टर को जोरदार थप्‍पड मारू। मैने भी दोस्‍त को जवाब दिया कि लड़की कितनी बदतमीजी से बात कर रही थी उसको, तुमने नहीं सुना, तो उसने मेरी बात को काटते हुए कहा कि कुछ भी हो कंडक्‍टर और ड्राइवर को 
लड़की से इस तरह बर्ताव नहीं करना चाहिए।

मैं दोस्‍त की बात सुन चौक गया। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि उसका मैं क्‍या जवाब दूं। लेकिन मेरे दिमाग मे यह प्रश्‍न खड़ा हो गया कि क्‍या पुरुषों को ही शिष्‍टाचार निभानी चाहिए, लड़कियों को नहीं? क्‍या लड़कियां ही बदतमीजी से बात कर सकती है और पुरुष नही? क्‍या सभी देश में लगातार बढ़ रहे यौन उत्‍पीडन के मामले में पुरुष ही दोषी हैं, महिलाएं नहीं?   

इसी प्रश्‍न का उत्‍तर ढूढ़ रहा था तभी मध्‍यप्रदेश के इंदौर में वर्ष 2013 में फरवरी से लेकर दिंसबर तक होने वाले यौन उत्‍पीडन के कुछ मामले मुझे याद आने लगे जिसमें, 10 पुलिस रिपोर्ट ऐसे थे, जिसमें महिला ने अपनी दबंगई दिखाने के लिए पुरुष पर यौन उत्‍पीडन के आरोप लगाए थे। एक मामला ऐसा था कि जब किराए से रह रही महिला से जब मकान मालिक ने किराया मांगा तो, उसने मालिक के ऊपर यौन उत्‍पीडन जैसे गंभीर आरोप लगा दिए।

हमारा कानून भी इस तरह के आरोपों में सच्‍चाई जानने का प्रयास नहीं करने देता है जिससे, एक बेगुनाह व्‍यक्ति सलाखों के पीछे चला जाता है। इंदौर के मामले में जेल से छुटने के बाद मकान मालिक ने खुदकुशी कर ली, जब जांच हुई तो उसके खिलाफ लगे आरोप गलत निकले। इस तरह के कई आरोप रोज भारत में पुरुषों पर लगाए जाते हैं जिनमें से 50 फीसदी आरोप गलत होते हैं।

मैं किसी पुरुष को इस तरह के आरोपों से बचाने का प्रयास नहीं कर रहा हूं और ना ही किसी महिला पर हुए अत्‍याचार को गलत बता रहा हूं। मगर यह प्रश्‍न अवश्‍य कर रहा हूं कि उसके द्वारा लगाए गए इस तरह के गंभर आरोप में कितनी सच्‍चाई है? अगर कोई महिला किसी पुरुष का यौन उत्‍पीडन करती है तो उसके ऊपर भारतीय संविधान के किस धारा के तहत दंड दिया जा सकता है? यह प्रश्‍न बहुत ही गलत हो सकता है, मगर रायपुर में मेरे दोस्‍त द्वारा बदतमीजी कर रही लड़की का पक्ष लेने से मुझे काफी दुख हुआ और इंदौर के घटना ने मुझे समाज से और भारतीय कानून से यह प्रश्‍न करने को मजबुर कर दिया।

महिलाओं के लिए भारत में कई तरह के कानून हैं जिसका प्रयोग कर वह पुरुष को सलाखों के पीछे डाल सकती है, मगर भारत में पुरुषों की रक्षा के कौन सा कानून है?

आप सभी को एतराज फिल्‍म याद ही होगा जिसमें प्रियंका चोपडा अपने पद का प्रयोग कर अक्षय कुमार पर किस तरह के यौन उत्‍पीडन के आरोप लगाए थे जिसमें पूरी गलती प्रियंका की थी, जो बाद में पेश हुए साक्ष्यों और गवाहों में साबित हुआ। हमारी भारतीय न्‍यायालय से अनुरोध है कि इस तरह के मामले में अंतिम फैसला देते समय मामले से संबंधित सभी साक्ष्‍य देख की ही फैसला दें नहीं तो हमेशा ही एक बेगुनाह नागरिक अपराधी साबित होगा और अपराधी खुल्‍लेआम सड़को पर घूमता नजर आएगा।