Tuesday, 28 January 2014

यह कैसी गरीबी!

आज(28 जनवरी 2014) सूबह-सूबह, करीब 8 बजे, मैं अपने कॉलोनी से बाहर टहलने के लिए निकला। जब मुख्‍य रोड़ (एबी रोड) पहुंचा तो देखा की कॉलोनी से जुड़े इस रोड़ के पास स्थित नगर निगम जोन ऑफिस के बाहर तीन-चार महंगी गाडि़यां (दो पहीए और चार पहीए) सहित कई गाडि़यां खड़ी थी और बहुत सारे लोग जोन के अंदर और बाहर बहुत सारे लोग खड़े थे। मैं समझा सूबह-सूबह कोई नेता आया है। अचानक मुझे याद आया, आज तो मंगलवार है और इंदौर में हर मंगलवार को गरीबों के लिए बीपीएल का कार्ड बनता है। इसलिए लोग अपना कार्ड बनवाने के लिए लाईन में खड़े हैं जिसमें महिलाएं, बूजुर्ग और बच्‍चें भी शामिल हैं।

पिछले मंगलवार को इंदौर नगर निगम के नेहरु नगर और सुखलिया स्थित जोन पर बीपीएल कार्ड बनवाने के लिए खड़े महिलाओं एवं पुरुषों पर पुलिस ने लाठीचार्च किया था जिसके कारण आज कार्ड नहीं बन रहा है। फिर भी लोगों की लंबी लाइनें लगी हुई थी।  

लाइन में लगे सभी व वहां पर उपस्थित सभी लोग अपना बीपीएल कार्ड बनवाना चाहते थे। जोन में आज कार्ड नहीं बनने के कारण्‍ वे सभी लोग उदास इस प्रतिक्षा में खड़े थे की शायद देर से ही सही कार्ड बनना शुरू हो जाए। मैं उन सभी लोगों को ध्‍यान से देखने लगा। वहां पर उपस्थित लगभग 400 लोगों में से लगभग 300 लोगों ने महंगे कपड़े पहन रखे थे। पुरुषों के शरीर पर लगभग 1000 रुपए की कोर्ट तथा महिलाओं ने लगभग 500 रुपए वाली साडि़यां पहन रखी थी। (आज कोई भी कोर्ट 1000 रुपए तथा साड़ी 500 रुपए से नीचे पर नहीं मिलती है।) साथ- ही-साथ जोन के बाहर कई मोटरसाईकल लगी हुई थी। (आज एक मोटरबाईक की कीमत कम से कम 40000 रुपए है।)

जोन के पास और अंदर खड़े लोगों से मैने बात की तो वो कहने लगे, हम तो भईया, बहुत गरीब है, रहने को आवास नही, खाने के लिए दो वक्‍त की रोटी नही, कमाई का कोई साधन नही, तथा पहनने के लिए कपड़ा तक नहीं है। हम ठंड में भगवान के भरोसे रहते हैं। इसी तरह की बाते सभी लोग कर रहे थे। उनका कहना था कि हम अब इस बीपीएल कार्ड के भरोसे हैं जिससे हमें दो वक्‍त का भोजन तो प्राप्‍त होगा। फिर मैं उनलोगों को आज कार्ड नहीं बनने की सूचना देकर उन्‍हें घर जाने को कह मैं भी वहीं पास के ठेले पर चाय पीने लगा।

चाय पीते-पीते मैं सोंच रहा था कि आखिर यह कौन सी ऐसी चीज है जिसे पाने के लिए लोग गरीबी का चोला पहन लेते हैं? उन्‍हें थोडी सी भी शर्म नहीं आती है गरीबों का हक मारने में। ठेले के पास बैठे कुछ लोग कह रहे थे की जिसकी थोडी प्रशासन और नेताओं के पास पहुंच है, उसका तो कार्ड बन ही जाएगा। क्‍या इससे गरीबों का हक प्राप्‍त हो पाएगा? क्‍या वो किसी भी सरकारी मुफ्त योजनाओं का लाभ उठा पांएगे?

इन्‍ही सब प्रश्‍नों का उत्‍तर ढूंढ रहा था, तभी मेरी चाय खत्‍म हो गई और मैं यह सोंच कर वहां से जाने लगा कि यह तो मानसिक गरीबी है, इसे कोई नहीं बदल सकता। हर धनवान को गरीबों का हक मारने में मजा आता है और उन्‍हें मुफ्त में मिल रही सुविधाओं को छिन कर उन्‍हें रास्‍ते पर और भीख मांगकर अपना गुजारा करने पर मजबुर कर देते हैं।

अब आप ही बताएं क्‍या कभी इस तरह की गरीबी भारत से खत्‍म होगी? और हां आप लोग भी उन लोगों से यह सवाल जरुर पूछें जिसके पास सब तरह की सुविधाएं रहने के बाद भी हर समय कहते रहते हैं कि हम सबसे गरीब है, कि वो गरीबों का मजाक क्‍यों उडा रहे हैं? अगर आप चैन ने नहीं बैठ सकते तो कृपया कर उन्‍हें तो कम-से-कम चैन से भीख मांगकर ही चैन से खाना खाने और फूटपाथ पर सोने तो दें।